देहरादून। बदलते दौर में जहां मिट्टी के दीयों की जगह बाजार में चाइनीज़ लाइट्स और इलेक्ट्रिक सजावट ने ले ली है, वहीं कुछ लोग आज भी अपनी परंपरागत कला को जीवित रखे हुए हैं। धर्मावाला निवासी सुखलाल का परिवार ऐसा ही एक उदाहरण है, जो पिछले पांच दशकों से मिट्टी के बर्तन और दीये बनाने का कार्य कर रहा है।
दीपावली का पर्व नजदीक है, और सुखलाल का परिवार इन दिनों मिट्टी के दीये तैयार करने में जुटा हुआ है। यह परिवार सीमित संसाधनों के बावजूद अपने पुस्तैनी पेशे को जीवित रखे हुए है। सुखलाल बताते हैं कि वे पिछले पचास सालों से यह काम कर रहे हैं और अब उनके दोनों बेटे भी इसमें हाथ बटा रहे हैं।
उनका कहना है कि सरकार की ओर से उन्हें आज तक किसी तरह की आर्थिक सहायता नहीं मिली है। मिट्टी की कमी और बढ़ते खर्च के कारण अब इस पारंपरिक कला को बनाए रखना मुश्किल होता जा रहा है। इसी वजह से क्षेत्र के कई कुम्हार यह पेशा छोड़ चुके हैं।
सुखलाल ने बताया कि अगर हालात ऐसे ही रहे तो भविष्य में यह परंपरा पूरी तरह समाप्त हो सकती है। उन्होंने सरकार से मांग की है कि खोखले दावे और वादों की जगह ऐसे पारंपरिक हस्तशिल्पकारों को चिह्नित कर उन्हें प्रोत्साहित किया जाए और आर्थिक सहायता दी जाए, ताकि यह कला आने वाली पीढ़ियों तक जीवित रह सके।
“हमने यह काम अपने बाप-दादाओं से सीखा है। मिट्टी की दिक्कत और खर्च बढ़ने से मुश्किल हो रही है, पर कोशिश है कि यह कला खत्म न हो।” – सुखलाल, कुम्हार, धर्मावाला





